घरेलू हिंसा-लघुकथा

 घरेलू हिंसा-लघुकथा

     पुलिस स्टेशन पर लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। घरेलू हिंसा का केस था। संदेह जताया रहा था कि पुलिस प्रकरण दर्ज करने में आनाकानी कर रही है। मीडिया कर्मीयों को बाहर ही रोक दिया गया था। परिजन मीडिया कर्मीयों तक पहूंच नहीं पा रहे थे। उपस्थित हर एक जन के हाथों में मोबाइल था। सभी अपने-अपने स्तर पर मामलें को अपने पक्ष में हथियाने की कोशिश कर रहे थे। हिंसा में लठ्ठ का उपयोग हुआ था जिसके कारण संबंधित के शरीर पर जख्म उभर आये थे। पत्रकार उन घावों की फोटों खींचना चाहते थे।


"आखिर पुलिस को प्रकरण दर्ज करने में परेशानी क्या है?" एक पत्रकार ने पूछ ही लिया।


"पीड़ीता को न्याय मिलना ही चाहिए!" एक महिला पत्रकार ने दंभ दिखाया।


"आप सही है किन्तु वह पीड़ीता नहीं पीड़ीत है!" इंस्पेक्टर साबह ने उस पुरूष को आगे किया जो अपनी पत्नी के द्वारा बूरी तरह मारपीट का शिकार हुआ था। पीड़ीत पुरूष चाहता था कि उसकी पत्नी पर घरेलू हिंसा का प्रकरण दर्ज हो। पुलिस दुविधा में थी और घरेलू हिंसा कानून की समीक्षा में कुछ वक्त ले रही थी।


पीड़ीत पुरूष द्वारा अपनी बीवी पर घरूलू हिंसा का आरोप सुनकर उपस्थित जनसैलाब शांत मुद्रा में दिखाई देने लगा। कुछ ही पल में भीड़ छंट गयी। पत्रकारों का जमावड़ा अन्य स्थान पर ब्रेकिंग न्यूज की तलाश में निकल पड़ा।


समाप्त

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प्रमाणीकरण- कहानी मौलिक रचना होकर अप्रकाशित तथा अप्रसारित है। कहानी प्रकाशनार्थ लेखक की सहर्ष सहमति है।


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जितेन्द्र शिवहरे (लेखक/कवि)

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