पुरुषार्थ - कहानी
पुरुषार्थ - कहानी -------------------- अजय का निर्णय स्वागत योग्य था किंतु भाई से बढ़कर अनिरुद्ध के साथ वह ऐसा करेगा किसी ने कभी सोचा नहीं था। नगर में जोरों की चर्चा थी। "इसमें गलत क्या किया?" सुमित्रा तरकारी छाँट रही थी। "लेकिन दोनों की दोस्ती का क्या? और अजय की ज़ुबान थकती नहीं थी राखी को भाभी कहते हुए!" सत्या ने भिंडी तराजू में डाल दी। "अरे! तो अच्छा ही हुआ न! किसी न किसी से तो उसे शादी करना ही थी!" सुमित्रा का जवाब था। आरोपों के साथ अजय भाग भी सकता था मगर ये राखी ही थी जिसके लिए उसने खुद का हौसला बढ़ाएं रखा। अनिरुद्ध के अवसान के इतने सालों बाद भी अजय की दरियादिली छुपाये नहीं छिपी। राखी के लिए उसका समर्पण किसी महान आश्चर्य से कम न था। एक सुधीर ही था जो सब जनता था। चाय की चुस्कियां लेते हुए वह बोला - "पति - पत्नि का स्वांग आखरी कब तक?" राखी के मन की बात सुधीर ही अजय से कह सकता था। उसकी आशा भरी नज़रे यहीं बयां कर रही थी। "अनिरुद्ध सिर्फ़ दोस्त नहीं था। भाई से बढ़कर था।" अजय का घिस...