अजय का निर्णय स्वागत योग्य था किंतु भाई से बढ़कर अनिरुद्ध के साथ वह ऐसा करेगा किसी ने कभी सोचा नहीं था। नगर में जोरों की चर्चा थी।


"इसमें गलत क्या किया?" सुमित्रा तरकारी छाँट रही थी।


"लेकिन दोनों की दोस्ती का क्या? और अजय की ज़ुबान थकती नहीं थी राखी को भाभी कहते हुए!" सत्या ने भिंडी तराजू में डाल दी।


"अरे! तो अच्छा ही हुआ न! किसी न किसी से तो उसे शादी करना ही थी!" सुमित्रा का जवाब था।


आरोपों के साथ अजय भाग भी सकता था मगर ये राखी ही थी जिसने उसका हौसला बढ़ाएं रखा। अनिरुद्ध के अवसान के इतने सालों बाद भी अजय की दरियादिली छुपाये नहीं छिपी। राखी के लिए उसका समर्पण किसी महान आश्चर्य से कम न था। 


एक सुधीर ही था जो सब जनता था। चाय की चुस्कियां लेते हुए वह बोला - 

"पति - पत्नि का स्वांग आखरी कब तक?" 


राखी के मन की बात सुधीर ही अजय से कह सकता था। उसकी आशा भरी नज़रे यहीं बयां कर रही थी।


"अनिरुद्ध सिर्फ़ दोस्त नहीं था। भाई से बढ़कर था।" अजय का घिसा - पीटा जवाब आया।


"लेकिन कब तक! कानूनी पति - पत्नी होकर भी तुम दोनों अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं सोचते?" सुधीर खड़ा हो गया।


"इससे अच्छा होता कि मैं विधवा ही रहती!" राखी के स्वर में सुधीर के समर्थन की झलक थी।


"क्या सच में तुम्हे लगता है कि अनिरुद्ध हमारे बीच नहीं है?" अजय झुंझलाहट में बोल पड़ा।


"राखी का संपूर्ण उत्तरदायित्व तुमने खुद लिया था और अपने वचन से अब तुम मुकर नहीं सकते..!" सुधीर यही नहीं रुका। वह आगे बोला - "क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारी गोद में भी अपनी संतान किलकारी लें।"


"राखी की मांग उसे पाने के लिए नहीं भरी!" सुधीर बोला।


"तो नहीं भरते! क्या किसी ने मजबूर किया था?" राखी ने पहली बार तेवर दिखाते हुए कहा।


"किसी ने मना भी तो नहीं किया!" अजय का स्वर राखी सरीखा ही था।


"दोनों बहस बंद करों। इस बात का निर्णय आज ही हो जाना चाहिए!" सुधीर डांटते हुए बोला।


"निर्णय हो चुका! राखी मेरे लिए अनिरुद्ध की पत्नि रहेंगी..! हमेशा!" कहते हुए वह दरवाजे से बाहर निकला गया।


सुधीर भी उसके पीछे हो लिया।


राखी अब आगे बढ़ाना चाहती थी। उसने बैग पैक करना ही उचित समझा। क्या कमी थी उसमें? पूरी दुनियां उसके सामने पड़ी थी। जिसे कहेगी वो साथ हो लेगा। 


कपड़ों के बीच अनिरुद्ध की तस्वीर उसके हाथ में मुस्कुरा रही थी। अनिरुद्ध की अपने दोस्त के प्रति कहीं एक - एक बात सच थी। अजय का मन उतना ही स्वच्छ था जितना कि उसका तन।


'सब उसे आम इंसान बनाने पर क्यों तुले है? अगर वह मान गया तो क्या होगा..! उसने जो किया ऐसा कितना पुरुष कर पाते है? एक स्त्री के साथ रहते हुए उसके सतित्व की रक्षा दूसरों से अधिक खुद से करना, क्या ये पुरुषार्थ नहीं!' राखी का मन ठहर चुका था।


अनिरुद्ध ने अधबीच में साथ छोड़कर जो अन्याय राखी के साथ किया, क्या उसकी भरपाई अजय करें! ये कैसा न्याय हुआ? समाज में पतिव्रता का तमगा तो अजय उसे दिला ही चुका है। सिर्फ परिवार बढ़ाना ही आखिरी मंज़िल हो, हर बार ये आवश्यक तो नहीं?


अजय घर लौट आया। उसकी विजय मुस्कान बता रही थी की सुधीर भी उसे हरा नहीं पाया। राखी आज पहली बार अजय की विजय पर गर्व कर रही थी। दोनों के हाथों में चाय की प्याली अजय की जीत का जश्न मना रही थी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्वरचित रचना आमंत्रण योजना - 2026

लव मैरिज- कहानी

नाsass! (कहानी) 'महिला युग'