भाग्यशाली* *लघुकथा*

 *भाग्यशाली* *लघुकथा*


ढोल नगाड़ों की ध्वनि को सुनते ही लोग घरों से बाहर झांकने लगे। कुछ लोग बालकनी से तो कुछ झरोखों से तांक रहे थे। मोहल्ले का जत्था अमरनाथ से अभी - अभी लौटा था। स्वजन अपने अपने परिजन की आरती उतार कर मुंह मीठा करवा रहे थे। बच्चे ढोलक की थाप पर नाचने गाने का मज़ा लूटने लगे। 

         तब ही एक ऑटो वहां आकर रुकी। दिनेश को देखते ही यात्रा से लौटे मित्र उदास हो गए। कितना मन था उसका भी बाबा बर्फानी के दर्शनों का? पूरी योजना ही उसकी थी। एन मौके पर पिता का टाईफाइड क्या बिगड़ा, दिनेश को एक हाॅस्पिटल से दूसरे हाॅस्पिटल दौड़ लगानी पड़ी। दो सप्ताह के उपचार के बाद पिता सकुशल घर लौटे। दिनेश का चेहरा खिला था। पिता को घर पहुंचाकर वह मित्रों के साथ रम गया।

       बरबस ही बातों में बात चल निकली कि भाग्यशाली कौन रहा? जीवन में प्रथम बार हिमालय होकर आए क्या वे या वह दिनेश, जिसने पिता के लिए भाग्यशाली होना भी स्वीकार नहीं किया।


लेखक -

जितेंद्र शिवहरे इंदौर

मो. 7746842533

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