आई हेव अ ब्वाॅय फ्रेण्ड

        एक कहानी रोज़-113 (04/08/2020)


*आई हेव अ ब्वाॅय फ्रेण्ड-लघु कहानी*


   *रूचि* को त्रिलोक के लिए यह कहना पड़ेगा उसे पता नहीं था। 'आई हेव अ ब्वाॅय फ्रेण्ड' वाक्य को रूचि ने हमेशा हथियार की तरह उपयोग किया था। इसके वाचन भर से युवक उससे दुरी बना लेते थे। किन्तु त्रिलोक की बात अलग थी। वह विवाहित होकर भी उसके मन में जगह बना चूका था। लेकिन जब अनु ने अपना पति रूचि से वापिस मांगा तब वह हतोत्साहित हो गयी। उस दिन शाम को त्रिलोक रूचि से मिलने आया हुआ था।

"साॅरी त्रिलोक! आई हेव अ ब्वाॅय फ्रेण्ड!" रूचि ने बिना डरे कह दिया।

"लेकिन तुम तो मुझसे प्यार करती थी न?" त्रिलोक ने पुछा।

"कैसा प्यार त्रिलोक! तुमने शादी शुदा होकर मुझसे संबंध बना रखा है। घर और बाहर दोनों ही जगह तुम आनन्द लुट रहे हो? क्या यही प्यार है?" रूचि ने कहा।

"अनु मेरा भुत है रूचि! और तुम भविष्य?" त्रिलोक अधीर होकर बोला।

"और मेरा भविष्य अमन है त्रिलोक। अच्छा होगा कि अब से तुम मुझे भूल जाओ।" रूचि ने स्पष्ट कर दिया।

त्रिलोक स्तब्ध था। रूचि जो कभी उसे इतना प्रेम करती थी, आज यकायक किसी ओर का गुणगान कर रही थी। वह अपनी भूल पर पछताने लगा। उसने अनु के पास पुनः लौटने का मन बनाया।

"साॅरी त्रिलोक! आई हेव अ ब्वाॅय फ्रेण्ड!" अनु ने अपने पति से कहा।

"तुम्हें शर्म नहीं मुझसे यह कहते हुये?" त्रिलोक गुस्से में  था।

"क्या तुम्हें आई थी?" अनु ने पुछा।

"मैं अपनी भुल पर शर्मिंदा हुं।" त्रिलोक बोला।

"भुल! पुरूष करे तो वह भुल! और स्त्री करे तो•••?

पुरूष अनेक स्त्रीयों से संबंध रख सकता है। किन्तु महिला नहीं। पुरूष को अपने किये पर माफी मिल सकती है तो महिला को क्यों नहीं।" अनु क्रोधित थी।

त्रिलोक अपने किये पर पछता रहा था। उसका सिर अनु के आगे झुका हुआ था।

"जिस तरह से तुम बहक गये थे उसी तरह मैं भी बहक गयी थी। यदि मैं तुम्हें माफ कर सकती हूं तो तुम्हें भी मुझे माफ करने की हिम्मत दिखानी होगी! बोलो! मैं अपनी भूल सुधारने को तैयार हूं। तब क्या तुम अपनी भुल को दौबारा नहीं दोहराने का मुझे वचन दे सकता हो?" अनु बोली।

त्रिलोक कुछ पलों के लिए आत्मचिंतन में खो गया।

"हां अनु! मैं वचन देता हूं की अपने मन और वचन से केवल तुम ही मेरे मन-मंदिर में विराजमान रहोगी। अन्य स्त्री की तरफ अब मैं आंख उठाकर भी नहीं  देखूंगा।" त्रिलोक ने खुलकर कह दिया।

"मुझे माफ कर दो त्रिलोक! मैंने तुम्हें सीख देने के उद्देश्य से झूठ कहा था कि मेरा अन्यत्र संबंध है। मैं कल भी तुम्हारी थी और आज भी सिर्फ तुम्हारी हूं।" अनु ने दिल की बात बता दी।

त्रिलोक प्रसन्न था और भावुक भी। अनु को अपने हृदय से लगाकर अपने पवित्र प्रेम को नयी ऊंचाइयां देने का त्रिलोक ने निश्चय किया। अनु ने त्रिलोक के संकल्प में अपना यथोचित योगदान देने का वचन दोहराया। दोनों के गिले-शिकवे दूर हो चूके थे। पति-पत्नि का परस्पर आलिंगन पवित्र प्रेम की व्यख्ता करने में सर्वथा उपयुक्त सिद्ध हो रहा था।


समाप्त 

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प्रमाणीकरण- कहानी मौलिक रचना होकर अप्रकाशित तथा अप्रसारित है। कहानी प्रकाशनार्थ लेखक की सहर्ष सहमती है।


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लेखक--

जितेन्द्र शिवहरे 

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